कनुप्रिया (समापन: समापन)

क्या तुमने उस वेला मुझे बुलाया था कनु?
लो, मैं सब छोड़-छाड़ कर आ गयी!

इसी लिए तब
मैं तुममें बूँद की तरह विलीन नहीं हुई थी,
इसी लिए मैंने अस्वीकार कर दिया था
तुम्हारे गोलोक का
कालावधिहीन रास,

क्योंकि मुझे फिर आना था!

तुमने मुझे पुकारा था न
मैं आ गई हूँ कनु।

और जन्मांतरों की अनन्त पगडण्डी के
कठिनतम मोड़ पर खड़ी होकर
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हूँ।
कि, इस बार इतिहास बनाते समय
तुम अकेले ना छूट जाओ!

सुनो मेरे प्यार!
प्रगाढ़ केलिक्षणों में अपनी अंतरंग
सखी को तुमने बाँहों में गूँथा
पर उसे इतिहास में गूँथने से हिचक क्यों गए प्रभु?

बिना मेरे कोई भी अर्थ कैसे निकल पाता
तुम्हारे इतिहास का
शब्द, शब्द, शब्द…
राधा के बिना
सब
रक्त के प्यासे
अर्थहीन शब्द!

सुनो मेरे प्यार!
तुम्हें मेरी ज़रूरत थी न, लो मैं सब छोड़कर आ गई हूँ
ताकि कोई यह न कहे
कि तुम्हारी अंतरंग केलिसखी
केवल तुम्हारे साँवरे तन के नशीले संगीत की
लय बन तक रह गई……

मैं आ गई हूँ प्रिय!
मेरी वेणी में अग्निपुष्प गूँथने वाली
तुम्हारी उँगलियाँ
अब इतिहास में अर्थ क्यों नहीं गूँथती?

तुमने मुझे पुकारा था न!

मैं पगडण्डी के कठिनतम मोड़ पर
तुम्हारी प्रतीक्षा में
अडिग खड़ी हूँ, कनु मेरे!

12 Replies to “कनुप्रिया (समापन: समापन)”

  1. Your meticulously researched and written collection of Hindi Poetry is an absolute treat to go through. I hope to see more updates in future – reminds me of my days in school and college spent in the company of stalwarts of Hindi writers.

  2. hindi sahitya k itihaas mein agar poetry ka naam liya jaega to usmein ek mahatvapurn naam hai dharam weer bharti ji ka maine inki kanupriya puri padi hai or us kitab ko padne k baad ye kahin nahi lagta k ye ek kavi apni baat keh raha hai apitu mujhe unki her ek kavita is tarah lagi jaise koi premi apni premika se ruth ker kahin chala gaya hai ya kisi karanwash apni priyesi se dur hua hai or uski premika use kitna yaad ker rahi hai..ye bahut acha prayas apne kiya hai k in sab kavitaon ko ek saath pathko k samukh prastut kiya hai..

  3. what a beauty of ur explation
    good , keep it up…

    mere blog se chan laine..
    मैंने नही प्यार तुमसे किया है
    दिल ने किया प्यार तुमसे
    मैंने तो दुनिया की बातें थी मानी
    किसी की न माना इसी ने ।
    मै तो कभी तेरे दर पे झुका ना
    सजदा किया है इसी ने ।
    मै तो अकड़ता रहा उमर भर
    समर्पण किया है इसी ने ।

    puri kavita padhe…
    http://dev-poetry.blogspot.com/

  4. Mujhe kripaya कालावधिहीन ka arth bataiye. Kavita bahut acchi lagi aur aapka dhanyavaad jo ise post kiyaa.

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