कनुप्रिया (पूर्वराग – पहला गीत)

ओ पथ के किनारे खड़े
छायादार पावन अशोक वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि
तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे
तुम को क्या मालूम कि
मैं कितनी बार केवल तुम्हारे लिए –
धूल में मिली हूँ
धरती से गहरे उतर
जड़ों के सहारे
तुम्हारे कठोर तने के रेशों में
कलियाँ बन, कोंपल बन, सौरभ बन, लाली बन –
चुपके से सो गई हूँ
कि कब मधुमास आये और तुम कब मेरे
प्रस्फुटन से छा जाओ!

फिर भी तुम्हें याद नहीं आया, नहीं आया,
तब तुम को मेरे इन जावक-रचित पाँवों ने
केवल यह स्मरण करा दिया कि मैं तुम्हीं में हूँ
तुम्हारे ही रेशे-रेशे में सोयी हुई –
और अब समय आ गया कि
मैं तुम्हारी नस-नस में पंख पसार कर उड़ूँगी
और तुम्हारी डाल-डाल में गुच्छे-गुच्छे लाल-लाल
कलियाँ बन खिलूँगी!

ओ पथ के किनारे खड़े
छायादार पावन अशोक वृक्ष
तुम यह क्यों कहते हो कि
तुम मेरे चरणों के स्पर्श की प्रतीक्षा में
जन्मों से पुष्पहीन खड़े थे

11 Replies to “कनुप्रिया (पूर्वराग – पहला गीत)”

    1. KOI NAHI HOTA APNA… KOI NAHI HOTA APNA..!
      HOTA THO KYU HOTA..EK PAL KI JEEVAN HAI YE KOI SAGAR JAISE VISHAL LEHAR NAHE HOTA..! JEEVAN HAI BHARI DHUKOKI AUR KUCH PAL MEIN SE KUCH PAL EK PAL KI SUKH HAI… SAOV VARSH KI ZINDAJE HAI PER EK PAL KI TABAHE BAS HAI US SAOV SAAL KI JEEVAN KO EK PAL MEIN ANTH KARE.. US MUMEED PE NA RAHE MERE DOSTO JEEVAN ANMOL HAI PAR APNE LEYE NAI JO KHUD KO KUSH SAMJE..JEEVAN THO UNKA JINKE PAAS DUKH HAI. SUKH KI JEEVAN HAR KOI BATHA SAKTHA HAI MEHSOOS KARTHA HAI.. LEKIN DUKH WO CHEEZ HAI JO DUKH KO PAYE BINA NA USSE SUKH MILE YA CHAIN MILE… YE HAI ANANTH SANSAAR MERE DOST ESE SAMJNA YA SAMJANA NA HO SAKEY. MAN MURATH JO MUK KE SAATH PAYE WO PAYE YE KUCH USE NA KOYE.
      munnujonam@gmail.com

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