कनुप्रिया (पूर्वराग – चौथा गीत)

यह जो दोपहर के सन्नाटे में
यमुना के इस निर्जन घाट पर अपने सारे वस्त्र
किनारे रख
मैं घण्टों जल में निहारती हूँ

क्या समझते हो कि मैं
इस भाँति अपने को देखती हूँ?

नहीं मेरे साँवरे!
यमुने के नीले जल में
मेरा यह वेतसलता-सा काँपता तन-बिम्ब, और उस के चारों
ओर साँवली गहराई का अथाह प्रसार, जानते हो
कैसा लगता है –

मानों यह यमुना की साँवली गहराई नहीं है
यह तुम हो जो सारे आवरण दूर कर
मुझे चारों ओर से कण-कण, रोम-रोम
अपने श्यामल प्रगाढ़ अथाह आलिंगन में पोर-पोर
कसे हुए हो!

यह क्या तुम समझते हो
घण्टों – जल में – मैं अपने को निहारती हूँ
नहीं, मेरे साँवरे!

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