‘मेघदूत’ के प्रति

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

1

हो धरणि चाहे शरद की
चाँदनी में स्नान करती,
वायु ऋतु हेमन्त की चाहे
गगन में हो विचरती,

हो शिशिर चाहे गिराता
पीत-जर्जर पत्र तरु के,

कोकिला चाहे वनों में
हो वसन्ती राग भरती,

ग्रीष्म का मार्तण्ड चाहे
हो तपाता भूमि-तल को,
दिन प्रथम आषाढ़ का मैं
‘मेघ-चर’ द्वारा बुलाता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

2

भूल जाता अस्थि-मज्जा-
माँस युक्त शरीर हूँ मैं,
भासता बस – धूम्र-संयुत
ज्योति-सलिल समीर हूँ मैं,

उठ रहा हूँ उच्च भवनों के
शिखर से और ऊपर,

देखता संसार नीचे
इन्द्र का वर वीर हूँ मैं,

मन्द गति से जा रहा हूँ
पा पवन अनुकूल अपने,
संग हैं बक-पंक्ति, चातक-
दल मधुर स्वर में गीत गाता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

3

झोपड़ी, गृह, भवन भारी,
महल औ’ प्रासाद सुन्दर,
कलश, गुम्बद, स्तम्भ, उन्नत
धरहरे, मीनार दृढ़तर,

दुर्ग देवल, पथ सुविस्तृत
और क्रीड़ोद्यान-सारे

मन्त्रिता कवि-लेखनी के
स्पर्श से होते अगोचर

और सहसा रामगिरि पर्वत
उठाता शीश अपना
गोद जिसकी स्निग्ध-छाया-
वान कानन लहलहाता!

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

4

देखता इस शैल के ही
अंक में बहु-पूज्य पुष्कर,
पुण्य-जल जिनको किया था
जनक-तनया ने नहाकर

संग जब श्री राम के वे
थीं यहाँ जब वास करतीं,

देखता अंकित चरण उनके
अनेक अचल-शिला पर,

जान ये पद-चिह्न वंदित
विश्व से होते रहे हैं,
देख इनको शीश मैं भी
भक्ति-श्रद्धा से नवाता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

5

देखता गिरि की शरण में
एक सर के रम्य तट पर
एक लघु आश्रम घिरा वन
तरु लताओं में सघनतर,

इस जगह कर्तव्य से च्युत
यक्ष को पाता अकेला,

निज प्रिया के ध्यान में जो
अश्रुमय उच्छवास भर-भर

क्षीणतन हो, दीनमन हो
और महिमाहीन होकर
वर्ष भर कांता-विरह के
शाप में दुर्दिन बिताता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

6

था दिया अभिशाप अलका-
ध्यक्ष ने जिस यक्षवर को,
वर्ष भर का दण्ड सहकर
वह गया कब का स्वघर को

प्रेयसी को एक क्षण उर से
लगा सब कष्ट भूला,

किन्तु शापित यक्ष तेरा
रे महाकवि जन्म-भर को!

रामगिरि पर चिर विधुर हो
युग-युगान्तर से पड़ा है,
मिल न पाएगा प्रलय तक
हाय, उसका श्राप त्राता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

7

देख मुझको प्राण-प्यारी
दामिनी को अंक में भर
घूमते उन्मुक्त नभ में
वायु के मृदु-मन्द रथ पर,

अट्टहास-विहास से मुख-
रित बनाते शून्य को भी

जन तुखी भी क्षुब्ध होते
भाग्य सुख मेरा सिहाकर;

प्रयणिनी भुज-पाश से जो
है रहा चिरकाल वंचित,
यक्ष मुझको देख कैसे
फिर न दुख में डूब जाता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

8

देखता जब यक्ष मुझको
शैल-श्रृंगों पर विचरता,
एकटक हो सोचता कुछ
लोचनों में नीर भरता,

यक्षिणी को निज कुशल-
संवाद मुझसे भेजने की

कामना से वह मुझे उठ
बार-बार प्रणाम करता;

कनक विलय-विहीन कर से
फिर कुटज के फूल चुनकर
प्रीति से स्वागत-वचन कह
भेंट मेरे प्रति चढ़ाता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

9

पुष्करावर्तक घनों के
वंश का मुझको बताकर,
कामरूप सुनाम दे, कह
मेघपति का मान्य अनुचर

कण्ठ कातर यक्ष मुझसे
प्रार्थना इस भाँति करता –

‘जा प्रिया के पास ले
सन्देश मेरा, बन्धु जलधर!

वास करती वह विरहिणी
धनद की अलकापुरी में,
शम्भु शिर-शोभित कलाधर
ज्योतिमय जिसको बनाता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

10

यक्ष पुनः प्रयाण के अनु-
कूल कहते मार्ग सुखकर,
फिर बताता किस जगह पर
किस तरह का है नगर, घर,

किस दशा, किस रूप में है
प्रियतमा उसकी सलोनी,

किस तरह सूनी बिताती
रात्रि, कैसे दीर्घ वासर,

क्या कहूँगा, क्या करूँगा,
मैं पहुँचकर पास उसके;
किन्तु उत्तर के लिए कुछ
शब्द जिह्वा पर न आता।

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

11

मौन पाकर यक्ष मुझको
सोचकर यह धैर्य धरता,
सत्पुरुष की रीति है यह
मौन रहकर कार्य करता,

देखकर उद्यत मुझे
प्रस्थान के हित, कर उठाकर

वह मुझे आशीष देता-
‘इष्ट देशों में विचरता,

हे जलद, श्रीवृद्धि कर तू
संग वर्षा-दामिनी के,
हो न तुझको विरह दुख जो
आज मैं विधिवश उठाता!’

‘मेघ’ जिस-जिस काल पढ़ता
मैं स्वयं बन मेघ जाता!

Other Information

Collection: Madhukalash (Published: 1937) 

11 Replies to “‘मेघदूत’ के प्रति”

  1. Woudn’t you like to make your own comments on each (or some) of these poems, describing why you like each, what interpretation you make of each, etc.? Just thought that would enrich the blog…

  2. I would not have made a good literature student 🙂 Somehow, find myself unable to analyze literary pieces. What appeals to me and what not depends a lot on the mental condition I read them in. Whenever I have something specific and articulable, I put that in my main blog. But articulating my ideas about the literary pieces, specially poetry, in general is not possible for me. So, I would let this blog just as a collection and if I have to say something about specific entries, it will go in my main blog. What I could possibly do is to put more information about the poems, like the collection from where they are taken etc. But that only if I have them myself 🙂

  3. क्या मुझे कहीं से श्री बच्चन की कविता “आज उठा मैं सबसे पहले” मिल सकती है? मैंने बहुत ढूँढा है, पर कहीं भी यह कविता मिल नहीं रही है. यह एक बच्चे की भावना पर आधारित है जो सुबह उठ कर देखता है की कैसे वो सबसे पहले चिडियों को चहचहाते सुनता है, सूरज को उगते देखता है…

  4. I am looking for ‘need ka nirman phir phir’.. a very motivating poem written by Bachachan ji.pl Can you pl help? Thanks.. i really really enjoyed reading of these poems.
    Sonali

  5. i realy enjoy read this great poem
    i realy like’s the harivans rai bachhachan ji &
    his any poem.
    i like so much “””””””””””MADHUSHALA””””””

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